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आंदोलन की पाठशाला बनते शिक्षण संस्थान! क्या भारत में शैक्षिक लोकतंत्र का नया अध्याय शुरू हो रहा है?

आंदोलन की पाठशाला बनते शिक्षण संस्थान! क्या भारत में शैक्षिक लोकतंत्र का नया अध्याय शुरू हो रहा है?

रोहतास संवाददाता चारोधाम मिश्रा की रिपोर्ट 

बिक्रमगंज (रोहतास ) भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका जागरूक नागरिक है, और उस नागरिक का निर्माण विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में होता है। किंतु आज एक विचित्र स्थिति सामने है। जिन परिसरों में ज्ञान, शोध और नवाचार की गूंज होनी चाहिए, वहाँ नारे, धरने, प्रदर्शन और तालाबंदी सामान्य दृश्य बनते जा रहे हैं। देश के किसी न किसी हिस्से में प्रतिदिन विद्यार्थी आंदोलनरत हैं।

कहीं शिक्षक नियुक्ति को लेकर संघर्ष है, कहीं छात्रवृत्ति, परीक्षा परिणाम, फीस वृद्धि, आरक्षण, छात्रसंघ चुनाव या प्रशासनिक निर्णयों के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रश्न यह नहीं कि आंदोलन बढ़ रहे हैं; प्रश्न यह है कि क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था लोकतांत्रिक हो रही है या संवादहीन?

यह मान लेना भूल होगी कि हर आंदोलन अनुशासनहीनता का परिणाम है। लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है। जब विद्यार्थी अपने अधिकारों, अवसरों और भविष्य के प्रश्न पर आवाज़ उठाते हैं, तो यह एक जागरूक समाज का संकेत है। लेकिन जब लगभग हर स्तर—प्राथमिक विद्यालय से लेकर केंद्रीय विश्वविद्यालय तक—असंतोष दिखाई देने लगे, तब यह केवल छात्र राजनीति का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के स्वास्थ्य का प्रश्न बन जाता है।

दुर्भाग्य से हमारे अधिकांश शिक्षण संस्थानों में निर्णय लेने की प्रक्रिया आज भी ऊपर से नीचे थोपे जाने वाली व्यवस्था पर आधारित है। विद्यार्थियों से संवाद कम होता जा रहा है, जबकि आदेश अधिक दिए जा रहे हैं। शिकायतों के समाधान की प्रभावी व्यवस्था नहीं है। परिणामस्वरूप छोटी-सी समस्या भी धीरे-धीरे आंदोलन का रूप ले लेती है। यह लोकतंत्र की सफलता नहीं, बल्कि संस्थागत संवाद की विफलता का संकेत है।

शैक्षिक लोकतंत्र का अर्थ अराजकता नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वपूर्ण सहभागिता है। विद्यार्थी को अधिकार मिले, पर उसके साथ कर्तव्य भी जुड़े हों। प्रशासन को अधिकार मिले, पर उसके साथ जवाबदेही भी हो। शिक्षक केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि संवाद और विश्वास के सेतु बनें। जब तक यह संतुलन स्थापित नहीं होगा, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं होंगे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने शिक्षा को लचीला, सहभागी और विद्यार्थी-केंद्रित बनाने का सपना दिखाया है। किंतु यदि संस्थानों में विद्यार्थियों की आवाज़ को सुनने की संस्कृति विकसित नहीं होती, तो यह सपना अधूरा रह जाएगा। लोकतंत्र केवल संविधान की पुस्तकों में नहीं, बल्कि विद्यालय की कक्षा, विश्वविद्यालय की परिषद, छात्र प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।

आज का विद्यार्थी इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग का विद्यार्थी है। वह प्रश्न पूछता है, जानकारी जुटाता है और अपने अधिकारों के प्रति पहले की तुलना में कहीं अधिक सजग है। उसे केवल आदेश स्वीकार करने वाला विद्यार्थी नहीं बनाया जा सकता। यदि संस्थान उसकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं करेंगे, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से आंदोलन में परिवर्तित होगा।

यह भी उतना ही सत्य है कि आंदोलन स्वयं में अंतिम समाधान नहीं हो सकते। शिक्षा का उद्देश्य संघर्ष की संस्कृति नहीं, बल्कि संवाद की संस्कृति विकसित करना है। यदि हर विवाद का समाधान धरना, बहिष्कार या ताला बंदी से होगा, तो शिक्षा की गुणवत्ता और शैक्षणिक वातावरण दोनों प्रभावित होंगे। इसलिए विद्यार्थियों और प्रशासन—दोनों को लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करना होगा।

आज आवश्यकता केवल नई शिक्षा नीति की नहीं, बल्कि नई शैक्षिक संस्कृति की है—ऐसी संस्कृति जिसमें विद्यार्थी केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि सहभागी हों; शिक्षक केवल अध्यापक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संवादकर्ता हों; तथा प्रशासन केवल नियंत्रक नहीं, बल्कि उत्तरदायी और पारदर्शी संस्था बने।

भारत यदि विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, तो उसे पहले अपने शिक्षण संस्थानों को संवाद, विश्वास और सहभागिता का केंद्र बनाना होगा। आंदोलन तब कम होंगे, जब संस्थानों में सुनने की संस्कृति विकसित होगी। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ यही है कि असहमति को स्थान मिले, संवाद को सम्मान मिले और निर्णय प्रक्रिया में सभी की भागीदारी सुनिश्चित हो।

भारत का विद्यार्थी बदल चुका है। अब प्रश्न यह नहीं कि वह आंदोलन क्यों करता है; प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था उसकी लोकतांत्रिक चेतना को समझने और सम्मान देने के लिए तैयार है? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो आंदोलन अपवाद नहीं, बल्कि आने वाले समय की सामान्य शैक्षणिक वास्तविकता होंगे।

लेखक परिचय

डा. देवेश पाण्डेय
सहायक प्रोफेसर
अनजबित सिंह महाविद्यालय बिक्रमगंज रोहतास VKSU

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