[wpdts-weekday-name] [wpdts-day]/ [wpdts-month]/ [wpdts-year] 

रेलवे संघर्ष समिति बिहटा अरवल एवं औरंगाबाद का आज दिल्ली के जंतर मंतर पर होगा धरना प्रदर्शनडबल म*र्डर के मुख्य आरोपी पप्पू सिंह ने किया सरेंडरडीएम सीतामढ़ी ने पंचायती राज विभाग की योजनाओं की समीक्षा, सोलर स्ट्रीट लाइट योजना पर जताई नाराजगीजनसमस्याओं के तत्वरित समाधान को लेकर जनता दरबार कार्यक्रम नए स्वरूप में आयोजितनरकटियागंज से पाटलिपुत्र के लिए प्रतिदिन 4 ट्रेनें जाती है और आती 3 है…..मैट्रिक, इंटर परीक्षार्थियों की सुविधा के लिए रेलवे का बड़ा फैसला, दो जोड़ी मेमू ट्रेन का विभिन्न हॉल्ट पर एक मिनट का दिया गया ठहराव।बटिया पुलिस की बड़ी कामयाबी, वाहन चेकिंग के दौरान पिक अप वाहन जप्त, 486 लीटर विदेशी शराब बरामद, चालक गिरफ्तारबरन कन्या उत्थान न्यास समिति द्वारा गया में कार्यक्रम आयोजित कर छह बेटियों को दी गई आर्थिक सहयोग, बतौर मुख्य अतिथि ओंकारनाथ बरनवाल हुए शामिलविभिन्न मांगों को लेकर तीन दिनो से लगातार चकाई में अनसन पर बैठे अनसन कारियों को पुर्व विधान पार्षद संजय प्रसाद ने तुड़वाया अनसनएसपी स्वर्ण प्रभात ने दो दारोगा को किया सस्पेंड- कार्य में लापरवाही बरतने का आरोप
Viral Videoउत्‍तर प्रदेशटॉप न्यूज़देशभाषाराज्य

नौगढ़ में सीड बाल गुलेल विधि से रोपे जा रहे हैं नए पौधे, बीजारोपण के लिए जारी है ये अनोखी पहल

स्थानीय ग्रामीणों ने इस अभियान की प्रशंसा की और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक बताया। उनका कहना था कि ऐसी छोटी-छोटी पहलकदमियां बड़े बदलाव ला सकती हैं।

नौगढ़ से शुरू हुआ अनोखा बीजारोपण अभियान

सीड बाल गुलेल विधि: पर्यावरण संरक्षण की नवीन तकनीक

मिट्टी की गोलियों में भरकर किए गए पेड़ों के बीज

गुलेल से जंगलों में फेंके गए हजारों बीज

चंदौली जिले के नौगढ़ में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में चंदौली जिले के नौगढ़ क्षेत्र में अभिनव प्रयोग की शुरुआत की गई है। महर्षि वाल्मीकि सेवा संस्थान के तत्वावधान में “सीड बाल गुलेल विधि” से जंगलों में बीजारोपण किया जा रहा है। इस नवाचारी विधि के तहत बच्चों और स्वयंसेवकों ने मिट्टी की गोलियों में बीज भरकर उन्हें जंगलों में गुलेल से फेंका, जिससे बरसात में बीज अंकुरित होकर प्राकृतिक रूप से पौधे बन सकें।

जानिए कैसे होती है सीड बाल गुलेल विधि
इस विधि में बीजों को पहले मिट्टी में लपेट कर गोलियों का रूप दिया जाता है। फिर इन गोलियों को धूप में सुखाया जाता है ताकि ये कठोर हो जाएं। इसके बाद इन ‘सीड बॉल्स’ को जंगलों में गुलेल या हाथ से फेंका जाता है। बारिश होने पर मिट्टी गल जाती है और बीज मिट्टी में मिलकर अंकुरित हो जाते हैं।

कई प्रजातियों के बीजों का उपयोग
संस्थान प्रमुख सुरेश सिंह ने बताया कि मई-जून में बच्चों ने गूलर, पीपल, बरगद, चिलबिल, कटहल, अमरूद, इमली, वेल, सहजन और पलाश जैसे पेड़ों के बीजों से हजारों सीड बाल तैयार किए।

जुलाई से जंगलों में बीजारोपण
बारिश की शुरुआत के साथ ही जुलाई में ये सीड बाल नौगढ़ के विभिन्न जंगलों में फेंके जा रहे हैं। अब तक ये बीज चिकनी, औरवाटाड़, हड़ही, वैरगाढ़, धनकुंवारी, बकुलघट्टा, गंगापुर, देवदत्तपुर, तेंदुआ, मजगाई परसहवां और चकरघट्टा के जंगलों में बिखेरे जा चुके हैं।

पर्यावरण के लिए वरदान
इस विधि की खासियत यह है कि इसमें पौधों को रोपने, पानी देने या गड्ढा खोदने की जरूरत नहीं पड़ती। यह पूरी तरह से प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो जंगलों में जैव विविधता बढ़ाने और हरियाली लाने में मददगार होती है।

बच्चों की सक्रिय भागीदारी
इस पहल में संस्थान के छात्रावास में रहने वाले बच्चों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विजेंद्र कुमार, महेश कुमार, कन्हैया लाल सहित कई बच्चों ने जंगलों में जाकर बीज फेंके और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया।

स्थानीय लोगों ने की सराहना
स्थानीय ग्रामीणों ने इस अभियान की प्रशंसा की और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक बताया। उनका कहना था कि ऐसी छोटी-छोटी पहलकदमियां बड़े बदलाव ला सकती हैं।

 

Check Also
Close