
कायस्थ समाज ने भारत के दो महानायक को किए नमन
बापू और शास्त्री के आदर्शों को आत्मसात किए जाने पर दिए जोर।
फर्क इतना सा रह गया कि एक नोट पर छप गए तो दूसरा लोगों के दिलों में बस गए।
भारत के लाल, लाल बहादुर को नहीं भूलेगा देश।
लगेगी भारत के लाल, लाल बहादुर शास्त्री की मूर्ति।
लोगों ने लिया निर्णय।
जिले के ख्याति प्राप्त विद्यालय ऑक्सफोर्ड पब्लिक स्कूल में हुई बैठक।
ऑक्सफोर्ड के मिलनसार छवि के धनी निर्देशक,मनोज सिन्हा ने किया सभा को संबोधित
जमुई जिला ब्यूरो बिरेंद्र कुमार की रिपोर्ट
अखिल भारतीय कायस्थ महासभा और ग्लोबल कायस्थ कांफ्रेंस की जिला इकाई ने संयुक्त रूप से भारत के दो महानतम नायकों को उनके अवतरण दिवस पर उन्हें समारोहपूर्वक याद किया।
कायस्थ समाज के हस्तियों ने इस दरम्यान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के चित्र पर माल्यार्पण किया और राष्ट्र के दोनों सुपात्रों को अखंड श्रद्धांजलि दी। मौके पर संगठन के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

निदेशक डॉ. मनोज कुमार सिन्हा ने जयंती समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि 02 अक्टूबर 1869 को जन्मे महात्मा गांधी “सत्याग्रह” और “अहिंसा” को जीवन का आधार मानते थे। आज गांधी जयंती न केवल एक राष्ट्रीय अवकाश है , बल्कि उनके आदर्शों को अपनाने और उन पर अमल करने का भी अवसर है।
स्वच्छता , सादगी , आत्मनिर्भरता और देशभक्ति बापू के जीवन के प्रमुख संदेश थे। गांधीजी के विचारों ने न केवल भारत में , बल्कि पूरे विश्व में लोगों को प्रेरित किया। दूसरी तरफ शास्त्री जी की बात करें तो वे सादगी , त्याग और दृढ़ संकल्प की मिसाल कायम करने वाले एक प्रेरणादायक हैं।
शास्त्री जी का जन्म भी 02 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय (अब पंडित दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन) में एक साधारण परिवार में हुआ था। चार वर्ष की आयु में उन्होंने मुगलसराय के ईस्ट सेंट्रल रेलवे इंटर कॉलेज में दाखिला लिया , जहां मौलवी बुद्धन मियां उनके पहले गुरु बने।

बनारस के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में शिक्षक निष्कामेश्वर प्रसाद मिश्र के प्रभाव में वे स्वतंत्रता संग्राम की ओर आकर्षित हुए। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन (1921) ने उनके किशोर मन को झकझोर दिया। उन्होंने काशी विद्यापीठ में भी दाखिला लिया , जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्थापित राष्ट्रीय संस्था थी।
यहां उन्होंने दर्शनशास्त्र और नीतिशास्त्र में प्रथम श्रेणी से स्नातक किया और ‘शास्त्री’ उपाधि प्राप्त की। स्वतंत्रता संग्राम में लाल बहादुर शास्त्री की भूमिका अडिग रही। 1921 में वे कांग्रेस से जुड़े और गांधीजी के नमक सत्याग्रह (1930) में सक्रिय भागीदारी की।
ब्रिटिश जेलों में कुल नौ वर्ष बिताए , जहां उन्होंने पश्चिमी दार्शनिकों , क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों की किताबें पढ़कर अपने विचारों को समृद्ध किया। जेल से बाहर आकर उन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनकी देशभक्ति का प्रमाण यह था कि वे कभी पद या सत्ता के भूखे नहीं रहे , बल्कि जनसेवा को अपना धर्म मानते थे।

1947 में भारत की आजादी के बाद लाल बहादुर शास्त्री का राजनीतिक सफर तेजी से बढ़ा। वे पहले उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव बने , फिर परिवहन एवं वित्त मंत्री। 1952 में नेहरू कैबिनेट में रेल मंत्री के रूप में उन्होंने भारतीय रेलवे को नई दिशा दी।
लेकिन 1956 के ट्रेन हादसे में 146 यात्रियों की मौत के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया , जो राजनीतिक ईमानदारी की अनुपम मिसाल है। बाद में गृह मंत्री (1961-63) और वाणिज्य मंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासनिक सुधारों को मजबूत किया।
उनके कार्यकाल में 1965 का मद्रास एंटी-हिंदी आंदोलन भी एक बड़ी चुनौती थी। हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने के प्रयासों का विरोध दक्षिण भारत में हुआ। लेकिन शास्त्री जी ने संयम से स्थिति संभाली और भाषाई सद्भाव पर जोर दिया। उनकी सादगी कथाओं से भरी है।
प्रधानमंत्री रहते वे साइकिल से बाजार जाते , धोती पहनते और सादा जीवन जीते थे। एक बार उन्होंने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी , जिसमें मात्र कुछ किताबें और कपड़े थे। 09 जून 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने।
उनका कार्यकाल मात्र 19 माह का रहा। यह चुनौतियों से भरा था। 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ गया। सीमाओं पर सैनिकों की वीरता और खाद्य संकट के बीच शास्त्री जी ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया , जो आज भी प्रासंगिक है।
इस नारे ने सेना का मनोबल बढ़ाया और किसानों को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी। युद्ध के दौरान उन्होंने गेहूं उत्पादन बढ़ाने के लिए हरित क्रांति की नींव रखी , जबकि दूध उत्पादन को भी प्रोत्साहन दिया।
उनका जीवन छोटे-छोटे कार्यों में भी नैतिकता और पारदर्शिता का प्रतीक था। 11 जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते के बाद उनकी रहस्यमयी मृत्यु ने देश को स्तब्ध कर दिया। उधर 02 अक्टूबर भारत के लिए एक खास दिन के रूप में अंकित किया जाता है।
इसी दिन महात्मा गांधी का भी जन्म हुआ था और उन्होंने भारत की आज़ादी में अहम भूमिका निभाई थी। इसे गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है और इसे अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में भी जाना जाता है।
गांधीजी ने अपना जीवन भेदभाव मिटाने और देश को खुशहाल बनाने के लिए समर्पित कर दिया था। निदेशक ने दोनों महानायकों को शत शत नमन किया और लोगों से उनके बताए मार्गों पर चलने का आग्रह किया।
डॉ. सिन्हा ने विशिष्ट जानकारी देते हुए कहा कि जयंती समारोह में संगठन ने लाल बहादुर शास्त्री की मूर्ति निर्माण कराए जाने का फैसला लिया है। जमुई में अगले वर्ष यानी 2026 में जयंती समारोह के पूर्व मूर्ति का अधिष्ठापन कर लिया जाना है। निदेशक ने इसके लिए कारगर प्रयास किए जाने का ऐलान किया।
विद्वान अभिभाषक अविनाश कुमार सिन्हा ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और सादगी के पर्याय लाल बहादुर शास्त्री को ह्रदयतल से भावांजलि देते हुए कहा कि एक ने हमें आजादी दिलाई तो दूसरे ने हमें ” सादा जीवन उच्च विचार ” का पाठ पढ़ाया। उन्होंने देश की खुशहाली के लिए बापू और शास्त्री के आदर्शों को आत्मसात किए जाने की अपील की।
गणमान्य नागरिक प्रवीण सिन्हा , राजीव कुमार सिन्हा , रंजन कुमार सिन्हा , प्रभात कुमार सिन्हा , विकास कुमार सिन्हा , राजेश कुमार सिन्हा , सत्येंद्र कुमार सिन्हा , निरंजन कुमार सिन्हा , कृष्ण मोहन प्रसाद , ऋतुराज सिन्हा , कुसुम सिन्हा , शिवांगी शरण , जूही राज सिन्हा , जय शौर्य सिन्हा , सुबोध कुमार , संतन कुमार , विकास सोनी आदि जनों ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया और गांधी एवं शास्त्री को अखंड भावांजलि दी।




















