
अरवल जिला ब्यूरो बिरेंद्र चंद्रवंशी की रिपोर्ट
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के निधन के समय लगभग 6 लाख लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए एकत्रित हुए थे।
जिनकी आंखों में आंसू और दिल में गहरा शोक था। यह संख्या उस दौर में अद्वितीय थी, जो आज के समय के हिसाब से 60 लाख लोगों के बराबर मानी जा सकती है।
दूसरी ओर जब कार्ल मार्क्स का निधन हुआ, तो उनकी अंतिम यात्रा में केवल चौदह लोग शामिल थे। लेकिन उन्हीं 14 लोगों ने मार्क्सवाद की विचारधारा को पूरी दुनिया में फैलाकर एक क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।
इसके विपरीत, बाबा साहेब के करोड़ों अनुयायी उनके सिद्धांतों को सक्रिय रूप से अपनाने और आगे बढ़ाने की बजाय, केवल श्रद्धांजलि देकर, अगरबत्तियां जलाकर, और जय भीम बोलकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते रहे।
अगर उन 6 लाख लोगों ने बाबा साहेब के विचारों को सक्रियता से अपनाया होता, तो सामाजिक न्याय और समानता की लड़ाई आज कहीं अधिक मजबूत और सशक्त होती।




















