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आसान नहीं छपरा में खेसारी लाल यादव की जंग, समझें पूरा जातीय और राजनीतिक गणित

आसान नहीं छपरा में खेसारी लाल यादव की जंग, समझें पूरा जातीय और राजनीतिक गणित

भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव पहली बार राजनीति के मैदान में कदम रख चुके हैं और इस बार राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने उन्हें छपरा विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया है। खेसारी के मैदान में उतरते ही यह सीट बिहार की हॉट सीटों में शुमार हो गई है।

भीड़ तो खेसारी की सभाओं में खूब उमड़ रही है, लेकिन बड़ा सवाल यही है — क्या यह भीड़ वोट में तब्दील हो पाएगी?

सारण की राजनीतिक तस्वीर

सारण जिले में कुल 10 विधानसभा सीटें हैं — मांझी, एकमा, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, गरखा, अमनौर, परसा और सोनपुर।

इनमें से 7 सीटों पर महागठबंधन, जबकि 3 सीटों पर बीजेपी का कब्जा है।

सारण के दो लोकसभा क्षेत्र — सारण और महाराजगंज — दोनों पर ही इस वक्त भाजपा का नियंत्रण है। राजीव प्रताप रूडी (सारण) और जनार्दन सिंह सिग्रीवाल (महाराजगंज) लगातार तीन-तीन बार सांसद चुने जा चुके हैं।

देश की राजनीति में सारण का योगदान

सारण की धरती ने देश को कई बड़े नेता दिए हैं —

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय, महामाया बाबू, और लालू प्रसाद यादव — सभी का सारण से गहरा संबंध रहा है।

कांग्रेस का गढ़ टूटा, लालू का दौर शुरू

कभी यह इलाका कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था।

लेकिन 1974 के छात्र आंदोलन के बाद तस्वीर बदल गई।

लालू यादव ने 1977 में यहां से जीत दर्ज कर कांग्रेस का गढ़ ध्वस्त किया और तब से सारण की राजनीति में राजद का वर्चस्व कायम रहा।

बीजेपी और राजद के बीच पुरानी जंग

सारण की राजनीति हमेशा यादव बनाम वैश्य समीकरण पर आधारित रही है।

1985 के बाद भाजपा ने यहां अपनी पैठ बनानी शुरू की और राजीव प्रताप रूडी ने 1996, 1999, 2014, 2019 और 2024 में जीत दर्ज की।

रूडी ने क्रमशः राबड़ी देवी, चंद्रिका राय और रोहिणी आचार्य जैसी दिग्गजों को मात दी।

छपरा का जातीय समीकरण

छपरा विधानसभा क्षेत्र में राजपूत (58,000),

यादव (50,000),

वैश्य (51,000) और मुस्लिम (33,000) मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं।

इसके अलावा कोरी (22,000),

रविदास (21,000),

ब्राह्मण (14,000),

कुर्मी (13,000),

भूमिहार (9,000) और पासवान (9,000) वोटर भी मौजूद हैं।

छपरा के शहरी इलाकों में वैश्य मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, इसलिए बीजेपी आमतौर पर वैश्य उम्मीदवारों पर दांव लगाती रही है।

इस बार का मुकाबला

बीजेपी ने इस बार अपने पुराने विधायक डॉ. सी.एन. गुप्ता की जगह छोटी कुमारी को टिकट दिया है। हालांकि, पूर्व मेयर राखी गुप्ता को टिकट नहीं मिलने से पार्टी में नाराजगी बढ़ गई। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया है।

वहीं, जन सुराज ने पूर्व एडीजी शिमला जय प्रकाश सिंह को उम्मीदवार बनाया है, जिससे अब लड़ाई चतुष्कोणीय हो चुकी है।

खेसारी के लिए बड़ी चुनौती

खेसारी लाल यादव के स्टारडम से स्थानीय जनता प्रभावित जरूर है, लेकिन उनका राजद से जुड़ाव कुछ मतदाताओं को दूरी बनाकर रख रहा है।

वहीं भाजपा में राखी गुप्ता की बगावत ने समीकरण और उलझा दिया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले 10 सालों में शहर के विकास, खनुआ नाला, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कोई ठोस काम नहीं हुआ है।

इसी वजह से कई मतदाता इस बार तीसरे विकल्प की तलाश में हैं।

नतीजा क्या होगा?

छपरा की जंग अब केवल स्टारडम बनाम संगठन की नहीं रह गई है, बल्कि जातीय समीकरण और स्थानीय नाराजगी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकती है। भीड़ किसके साथ है, यह तो दिख रहा है, लेकिन वोट किसके साथ जाएगा, यह चुनाव परिणाम ही बताएगा।

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