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भगवान का सबसे प्रिय भोजन अहंकार है: जीयर स्वामी जी महाराज

भगवान का सबसे प्रिय भोजन अहंकार है: जीयर स्वामी जी महाराज

रोहतास दावथ संवाददाता चारोधाम मिश्रा की रिपोर्ट 

दावथ( रोहतास): परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने प्रवचन करते हुए भगवान श्रीमन नारायण के सबसे प्रिय आहार व्यवहार पर चर्चा की।

स्वामी जी ने कहा भगवान समय-समय से सबके अहंकारों का नाश करते हैं। अहंकार से कोई भी अलग नहीं है। यहां तक की शंकर जी, ब्रह्मा जी, इंद्र भगवान, नारद जी सबको कभी ना कभी अहंकार आ गया था।

एक बार शंकर जी को भी अहंकार आ गया था। तब भगवान श्रीमन नारायण ने उनके अहंकार को भी खत्म किया। एक बार भस्मासुर तपस्या कर रहा था। समय-समय से कई लोग शंकर जी का तपस्या साधना करने लगते हैं।

जिसके फल स्वरुप शंकर जी वरदान भी देते हैं। जब भस्मासुर तपस्या कर रहा था। उस समय शंकर जी प्रसन्न होकर भस्मासुर से कहे वरदान मांगो। अब भस्मासुर ने शंकर जी से वरदान मांग लिया कि जिसके सिर पर हम हाथ रख दें वह भस्म हो जाए।

शंकर जी ने वरदान दे दिया। अब भस्मासुर इस वरदान का प्रैक्टिकल जांच करने के लिए शंकर जी पर ही प्रयोग करना चाहा। अब वहां से शंकर जी भागने लगे पीछे-पीछे भस्मासुर दौड़ रहा था।

शंकर जी भागते-भागते बिहार के कैमूर के पहाड़ी क्षेत्र में गुप्ता धाम के पहाड़ों में घुस गए। आज जिसे गुप्ता धाम के नाम से जाना जाता है। उस समय शंकर जी मानो मन ही मन कह रहे हैं कि इस पागल भस्मासुर से हमें कोई बचाएं।

उसी समय भगवान श्रीमन नारायण ब्रह्मचारी के रूप में प्रकट हुए। भस्मासुर के सामने एक बालक ब्रह्मचारी के रूप में आकर के खड़े हो गए। भस्मासुर कहने लगा रास्ते से हट जाओ हम किसी का पीछा कर रहे हैं।

अब वहां पर भगवान श्रीमन नारायण भस्मासुर से कहने लगे कि थोड़ा रुक जाओ। आराम कर लो थके हुए हो विश्राम कर लो। लेकिन भस्मासुर गुस्से में लाल होकर कहने लगा कि मेरे मार्ग से हट जाइए।

फिर भगवान श्रीमन नारायण ने भस्‍मासुर से पूछा आप कहां दौड़ रहे हैं। कहां भाग रहे हैं क्या बात है। मिडिया संचालक रविशंकर तिवारी ने बताया कि स्‍वामी जी कहा कि भस्मासुर ने कहा कि मुझे शंकर जी ने वरदान दिया है कि हम जिसके सिर पर हाथ रख देंगे वह जलकर भस्म हो जाएगा।

भगवान ने कहा अच्छा यह बात है। देखो शंकर जी के बात पर तुम विश्वास मत करो। यह कुछ भी कहते रहते हैं। लेकिन कुछ होता नहीं है।

भस्मासुर ने कहा नहीं नहीं हम आपकी बातों पर विश्वास नहीं करेंगे। शंकर जी जिसको भी वरदान दे देते हैं वह बिल्कुल होता है। लेकिन वहां पर भगवान श्रीमन नारायण उसको किसी भी प्रकार से रोकना चाह रहे थे।

तब भगवान श्रीमन नारायण ने कहा ठीक है यदि तुमको लगता है कि उनके द्वारा दिया गया वरदान सही होता है तो तुम पहले इसकी परीक्षा क्यों नहीं कर लो। तुम ऐसा करो की सबसे पहले अपने हाथ को पैर के नीचे रखो देखो क्या होता है।

भस्मासुर ने अपने हाथों को पैर के नीचे रखा कुछ नहीं हुआ। भगवान श्रीमन नारायण ने कहा ठीक है थोड़ा हाथ को और ऊपर करो। थोड़ा हाथ को और ऊपर करो। इस प्रकार से नीचे से शरीर के ऊपर धीरे-धीरे हाथों को बढ़ाते हुए कंधे पर भस्मासुर लेकर चला आया। फिर भी कुछ नहीं हुआ।

तब भगवान श्रीमन नारायण ने कहा देखो शंकर जी के वरदान से कुछ होता नहीं है। तुम अपने हाथों को और थोड़ा ऊपर की तरफ लेकर जाओ।

धीरे-धीरे हाथों को ऊपर ले जाते ले जाते हुए भगवान श्रीमन नारायण ने भस्मासुर को समझाते हुए उसके अपने हाथ को ही उसके सिर पर रखवा दिए। अब जैसे ही भस्मासुर ने अपना हाथ अपने सर पर रखा जल करके वहीं पर भस्म हो गया।

इस प्रकार भगवान श्रीमन नारायण ने शंकर जी की रक्षा करते हुए उनके अहंकार को खत्म किया।

अग्नि देवता को एक बार अहंकार हो गया था। तब भगवान श्रीमन नारायण ने उन्हें एक तृण देकर बोले कि इसे जला दीजिए। लेकिन अग्नि देवता अपने पूरे तपोबल के द्वारा भी तृण को नहीं जला पाए।

एक बार ब्रह्मा जी को भी अहंकार हो गया था तब उन्होंने भगवान कृष्ण के सभी मित्र मंडली ग्वाल-वाल को चुरा लिए थे।इस प्रकार से समय-समय से भगवान श्रीमन नारायण सभी लोगों के अहंकारों का नाश करते हैं।

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