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बिहारराज्यरोहतास

संत रविदास जी हिन्दू समाज के महान स्तंभ थे: चारों धाम मिश्रा

संत रविदास जी हिन्दू समाज के महान स्तंभ थे: चारों धाम मिश्रा

दावथ (रोहतास) संत गुरु रविदास जी हिन्दू समाज के महान् स्तम्भ थे। वह एक संत ही नहीं अपितु महाज्ञानी और योगी भी थे। उनका जन्म माघ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को वाराणसी जिले में हुआ था। चँवर पुराण के अनुसार चँवर वंश, सूर्यवंशी क्षत्रिय राजवंश था जिसकी स्थापना महाराज चँवर सेन ने की थी, जिसमें सूर्य सेन एवं चामुण्डा राय बड़े शक्तिशाली राजा हुए थे।

परम् पूज्य संत रामानंद जी, रविदास जी के गुरु थे।जब संत रविदास जी ने सदना कसाई को हिन्दू समाज में प्रवेश दिलाकर रामदास बनाया तब सिकन्दर शाह लोधी बहुत क्रोधित हुआ और उसने संत रविदास जी को बुलाया और उन्हें मुसलमान बनने को कहा।

रविदास जी ने साफ़ मना कर दिया तो उसने उन्हें पाँच जागीर देने का प्रलोभन दिया। सिकन्दर ने रविदास जी को मुसलमान बनाने के लिए अनेक प्रयास किये. लेकिन वो सफल नहीं हो पाया।

तब सिकन्दर ने रविदास को जेल में डाल दिया।जेल में भगवान श्री कृष्ण ने इन्हें साक्षात दर्शन दिये।दूसरी ओर सिकन्दर बहुत बेचैन था।उसने रविदास जी को जेल से रिहा तो कर दिया लेकिन साथ में यह आज्ञा दी कि उनका पूरा कुनबा और उनकी शिष्य मण्डली वाराणसी के आस-पास मरे हुए पशुओं को उठाओ।

संत रविदास जी एवं उनके शिष्यों ने मरे हुए पशुओं को उठाना स्वीकार किया लेकिन अपना हिन्दू धर्म का त्याग कर के मुसलमान बनना स्वीकार नहीं किया।

     राजस्थान की रानी गुरु-दीक्षा लेने रविदास जी के आश्रम में गयी।वहां का उच्च कुलीन सौंदर्य और शालीनता पूर्ण व्यवहार देख कर गुरु रविदास जी से दीक्षा लेने को तैयार हो गई।

इस घटना से भी यह तथ्य उजागर होता है कि रविदास जी का वंश और शिष्य परम्परा उच्च कुलीन थी।भारत भ्रमण के समय चितौड़ की रानी मीराबाई ने भी उन्हें अपना गुरु बनाया।

संत रविदास जूते बनाने का काम करते थे। वे जूते बनाते समय इतने मग्न हो जाते थे जैसे स्वयं भगवान के लिए बना रहे हों। वे भगवान की भक्ति में समर्पित होने के साथ अपने सामाजिक और पारिवारिक कर्तव्यों का भी बखूबी निर्वहन किया।इन्होंने लोगों को बिना भेदभाव के आपस में प्रेम करने की शिक्षा दी, और इसी प्रकार से वे भक्ति मार्ग पर चलकर संत रविदास कहलाए।

उनके द्वारा दी गई शिक्षा आज भी प्रासंगिक है।मन चंगा तो कठौती में गंगा’ उनका यह प्रसंग बहुत लोकप्रिय है। इसका अर्थ है कि यदि मन पवित्र है और जो अपना कार्य करते हुए, ईश्वर की भक्ति में तल्लीन रहते हैं उनके लिए उससे बढ़कर कोई तीर्थ स्नान नहीं है।

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