
“मर्यादा ही सर्वोच्च आभूषण”: श्री विनोद व्यास जी महाराज
रोहतास दावथ संवाददाता चारोंधाम मिश्रा की रिपोर्ट
दावथ (रोहतास) श्री शतचंडी महायज्ञ, केदार चवरी में प्रवचन करते हुए आचार्य श्री विनोद व्यास जी महाराज ने कहा कि मर्यादा, एकता और स्वधर्म ही मानव जीवन का आधार हैं।
उन्होंने कहा, “शक्तियां भले अलग दिखें, लेकिन ब्रह्म स्वरूप में कोई भेद नहीं होता। भेद करना अज्ञान का लक्षण है।” भगवान राम, कृष्ण, शिव या दुर्गा – रूप अलग हैं पर तत्व एक ही है। इसलिए धर्म के नाम पर भेदभाव करना उचित नहीं।
प्रकृति से मर्यादा की सीख देते हुए व्यास जी बोले, “हिमालय हमारी प्राकृतिक रक्षा दीवार है और प्रकृति स्वयं मानवता का पोषण करती है। कोयल अपनी वाणी से मर्यादा का संदेश देती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी आचरण में मर्यादा रखनी चाहिए।”
सच्ची पतिव्रता की परिभाषा बताते हुए उन्होंने कहा कि “सच्ची पतिव्रता वही है, जो पूरे परिवार के प्रति सम्मान व प्रेम रखे।”
श्री व्यास जी ने कहा कि भगवान श्रीराम को जीवन में कभी सुख नहीं मिला, पर उन्होंने मर्यादा को कभी नहीं छोड़ा। कैकेयी की गलत प्रेरणा से 14 वर्ष का कठिन वनवास भोगा, फिर भी पिता की आज्ञा को सर्वोपरि माना।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि राम के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने कर्तव्य, संस्कार और मर्यादा पर अडिग रहें।




















