
भूल जाने का अधिकार: क्या अतीत से मुक्ति भी अधिकार है?
रोहतास संवाददाता चारोधाम मिश्रा की रिपोर्ट
बिक्रमगंज (रोहतास ) डिजिटल युग ने मनुष्य की स्मृति को लगभग असीमित बना दिया है। कोई पुरानी घटना, आरोप या रिकॉर्ड वर्षों बाद भी कुछ क्लिक में सामने आ सकता है। कभी समय के साथ पीछे छूट जाने वाली बातें अब इंटरनेट पर स्थायी रूप से मौजूद रह सकती हैं। ऐसे में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न सामने आता है—क्या व्यक्ति को अपने अतीत से आगे बढ़ने का अधिकार भी होना चाहिए? इसी प्रश्न के केंद्र में ‘Right to be Forgotten’ यानी ‘भूल जाने का अधिकार’ की अवधारणा है।
भारतीय संविधान में ‘Right to be Forgotten’ नाम से कोई स्वतंत्र मौलिक अधिकार स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है। लेकिन इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के व्यापक दायरे से जोड़कर देखा जा सकता है। अनुच्छेद 21 व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017) में निजता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार माना और निजता को व्यक्ति की गरिमा, स्वायत्तता तथा स्वतंत्र अस्तित्व से जोड़ा। इसी संवैधानिक विकास से यह तर्क उभरता है कि कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को अपनी पुरानी और अप्रासंगिक व्यक्तिगत सूचनाओं की सार्वजनिक उपलब्धता सीमित करने का अधिकार भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित किया जा सकता है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। Right to be Forgotten को अभी अनुच्छेद 21 में स्पष्ट रूप से लिखित या पूर्णतः स्वतंत्र अधिकार कहना उचित नहीं होगा। इसकी संवैधानिक स्थिति न्यायिक व्याख्या के माध्यम से विकसित हो रही है। यह अधिकार भी निरपेक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सार्वजनिक हित, न्यायिक पारदर्शिता और सूचना तक पहुंच जैसे संवैधानिक मूल्यों के साथ संतुलित करना होगा।
इसी बहस को हालिया इलाहाबाद उच्च न्यायालय के Mohd. Yunus Ansari v. Union of India निर्णय ने महत्वपूर्ण संदर्भ दिया है। 7 मई 2026 को दिए गए इस फैसले में न्यायालय के सामने ऐसे व्यक्ति का मामला था, जिसे अपराध के समय नाबालिग होने के कारण Juvenile Justice Board के समक्ष पेश किया गया था। बाद में उसके पासपोर्ट आवेदन पर पुराने juvenile conviction और पुलिस रिकॉर्ड का प्रभाव पड़ा।
न्यायालय ने Juvenile Justice Act, 2015 की धारा 24 के संदर्भ में किशोर के पुराने रिकॉर्ड और उसके भविष्य के बीच संबंध पर विचार किया। किशोर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार, पुनर्वास और समाज में पुनर्स्थापन भी है। इसी संदर्भ में न्यायालय ने juvenile delinquency के रिकॉर्ड को हटाने या नष्ट करने के अधिकार को ‘fresh start’ के सिद्धांत से जोड़ा और ‘right to be forgotten’ की अवधारणा का उल्लेख किया।
इस निर्णय को समझते समय इसकी सीमा को ध्यान में रखना जरूरी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रत्येक व्यक्ति को उसकी पसंद की हर पुरानी सूचना इंटरनेट से हटाने का कोई सार्वभौमिक अधिकार घोषित नहीं किया। निर्णय का संदर्भ juvenile record और Juvenile Justice कानून द्वारा दी गई विशेष सुरक्षा था। फिर भी यह फैसला इस व्यापक संवैधानिक बहस को मजबूती देता है कि व्यक्ति की वर्तमान पहचान को उसकी पुरानी गलती से अनंतकाल तक निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए।
यहीं Right to be Forgotten का मानवीय पक्ष सामने आता है। यदि कानून किसी बच्चे को सुधार और पुनर्वास का अवसर देता है, तो उसके पुराने juvenile record को जीवनभर उसके विरुद्ध इस्तेमाल करना उस व्यवस्था के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है। किसी किशोर की एक गलती उसके पूरे वयस्क जीवन का स्थायी परिचय नहीं बननी चाहिए।
लेकिन इस अधिकार की दूसरी सीमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लोकतांत्रिक समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सूचना तक पहुंच और सार्वजनिक जवाबदेही को भी संरक्षण प्राप्त है। प्रत्येक पुरानी सूचना को मिटाना न तो संभव है और न उचित। सार्वजनिक पदाधिकारियों से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य, न्यायिक निर्णय, सार्वजनिक घटनाओं के रिकॉर्ड या ऐतिहासिक दस्तावेज केवल इसलिए समाप्त नहीं किए जा सकते कि वे किसी व्यक्ति के लिए असुविधाजनक हैं।
इसलिए ‘Right to be Forgotten’ को ‘इतिहास मिटाने का अधिकार’ कहना उचित नहीं होगा। इसका वास्तविक प्रश्न यह है कि ऐसी व्यक्तिगत सूचना, जिसका वर्तमान में पर्याप्त सार्वजनिक महत्व नहीं रह गया है, उसे अनिश्चितकाल तक सार्वजनिक रूप से आसानी से उपलब्ध रखना कितना उचित है।
इस संदर्भ में de-indexing एक संभावित संतुलित रास्ता हो सकता है। सूचना का मूल रिकॉर्ड सुरक्षित रहे, लेकिन व्यक्ति का नाम खोजने पर वह पुरानी सूचना सामान्य search results में प्रमुखता से सामने न आए। इससे व्यक्ति की निजता और समाज के सूचना-अधिकार के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
भारत में यह क्षेत्र अभी विकसित हो रहा है। Digital Personal Data Protection Act, 2023 ने व्यक्तिगत डेटा के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण वैधानिक ढांचा दिया है, लेकिन इसे यूरोपीय GDPR के समान व्यापक Right to be Forgotten मानना उचित नहीं होगा। भारत में इस अधिकार का स्वरूप संवैधानिक निजता, न्यायिक व्याख्याओं और डेटा संरक्षण संबंधी कानूनों के क्रमिक विकास से निर्धारित होगा।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि डिजिटल दुनिया में क्या व्यक्ति को बदलने और नई शुरुआत करने का अवसर मिलेगा। विशेषकर बच्चों और किशोरों के मामले में यह प्रश्न और संवेदनशील है। यदि किशोर न्याय व्यवस्था सुधार और पुनर्वास को प्राथमिकता देती है, तो डिजिटल रिकॉर्ड को भी उस उद्देश्य के अनुरूप देखने की आवश्यकता है।
इसलिए भविष्य की चुनौती केवल यह तय करना नहीं है कि क्या मिटाया जाए, बल्कि यह निर्धारित करना है कि किस सूचना का सार्वजनिक हित में बने रहना आवश्यक है और किस सूचना को व्यक्ति के वर्तमान जीवन पर अनिश्चितकाल तक प्रभाव डालने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए स्पष्ट कानूनी कसौटियां, पारदर्शी प्रक्रिया और न्यायिक निगरानी आवश्यक होगी।
डिजिटल दुनिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि तकनीक भूलती नहीं, जबकि न्याय कभी-कभी व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर देना चाहता है। Right to be Forgotten इसी तनाव के बीच निजता और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन खोजने की कोशिश है।
अंततः, इस अधिकार का उद्देश्य समाज की स्मृति मिटाना नहीं, बल्कि स्मृति और मानवीय गरिमा के बीच संतुलन स्थापित करना है। लोकतंत्र को सार्वजनिक हित के लिए आवश्यक सत्य को सुरक्षित रखना होगा, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि हर व्यक्ति केवल अपने अतीत का योग नहीं है। कानून का दायित्व केवल यह याद रखना नहीं कि व्यक्ति ने क्या किया था; उसका दायित्व यह भी सुनिश्चित करना है कि सुधार के बाद उसे अपने वर्तमान और भविष्य के साथ जीने का अवसर मिले।
लेखक परिचय
डा देवेश पाण्डेय
सहायक प्रोफेसर राजनीति विज्ञान विभाग अनजबित सिंह महाविद्यालय बिक्रमगंज रोहतास




















