
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की अनकही दास्तान : दशम किस्त
पत्रकारिता की आर्थिक चुनौतियाँ और बदलता मीडिया परिदृश्य, “कलम की कीमत, खबर का बाजार और संघर्षरत पत्रकार का सच”
ब्यूरो बिरेंद्र चंद्रवंशी की रिपोर्ट
(आलेख -संतोष श्रीवास्तव वरीय पत्रकार एवम साहित्यकार)
जहानाबाद: “स्याही की बूंदों से इतिहास लिखा जाता है,
पर स्याही खरीदने का दर्द कौन जानता है।
जो दूसरों के घरों में उजाले की खबर देता है,
अक्सर उसके अपने घर का चिराग़ धुंधला रहता है।”
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन इस स्तंभ की नींव में छिपे संघर्षों को बहुत कम लोग देख पाते हैं। एक समय था जब समाचार-पत्र केवल जनहित और सामाजिक सरोकारों के प्रतीक माने जाते थे। संपादक की कलम सत्ता के सिंहासन को चुनौती देती थी और पत्रकार का नाम समाज में सम्मान का पर्याय होता था।
समय बदला, तकनीक बदली और बदल गया मीडिया का पूरा परिदृश्य। अब खबरें केवल सूचना नहीं रहीं, बल्कि बाजार की वस्तु बन गई हैं। टीआरपी, व्यूज, क्लिक और विज्ञापन ने पत्रकारिता के मूल्यों को नई कसौटी पर खड़ा कर दिया है।
“खबर अब खबर कम, कारोबार अधिक है,
सच का सौदा भी कभी-कभी लाचार अधिक है।
कलम अब भी चलती है इंसाफ़ के लिए,
मगर उसके सामने विज्ञापन का दरबार अधिक है।”
आज छोटे और मध्यम समाचार संस्थानों के सामने आर्थिक संकट सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। सरकारी विज्ञापन सीमित हैं, निजी विज्ञापन बड़े मीडिया घरानों की ओर झुकते हैं और डिजिटल मीडिया ने पारंपरिक आय के स्रोतों को कमजोर कर दिया है।
गांव-कस्बों में कार्यरत पत्रकारों की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। वे समाज की समस्याओं को उजागर करते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं, लेकिन उनके श्रम का उचित मूल्य उन्हें शायद ही मिल पाता है। कई पत्रकार सम्मान और दायित्व के सहारे काम कर रहे हैं, जबकि आर्थिक सुरक्षा का अभाव लगातार बना हुआ है।
“जो सच की मशाल लेकर अंधेरों से लड़ता है,
वही अक्सर रोज़ी-रोटी की चिंता में घिरता है।
समाचार की नाव को वह पार लगाता है,
पर जीवन का समंदर खुद अकेले तैरता है।”
सोशल मीडिया के दौर ने पत्रकारिता को नई गति तो दी है, लेकिन इसके साथ अनेक चुनौतियाँ भी पैदा हुई हैं। अब हर व्यक्ति सूचना का स्रोत है और हर मोबाइल एक संभावित समाचार कक्ष। ऐसे में तथ्य और अफवाह के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है।
पत्रकारिता का भविष्य तकनीक से नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता से तय होगा। मशीनें समाचार पहुँचा सकती हैं, लेकिन संवेदना, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व केवल पत्रकार ही दे सकता है।
“बदलेंगे माध्यम, बदलेंगे दौर के अंदाज़,
पर सच की तलाश का नहीं बदलेगा आगाज़।
जब तक समाज में अन्याय और प्रश्न रहेंगे,
तब तक पत्रकारिता के दीप भी जलते रहेंगे।”
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज आर्थिक चुनौतियों, तकनीकी बदलावों और बाजारवादी दबावों के बीच खड़ा है। फिर भी उम्मीद बाकी है, क्योंकि पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक नैतिक दायित्व और जनविश्वास की सबसे बड़ी पूंजी है।




















