
कमजोरी को उम्र का असर समझने की भूल न करें
सिर्फ नमक की कमी नहीं, शरीर में सोडियम का बिगड़ा संतुलन भी हो सकता है बड़ी वजह
रोहतास संवाददाता चारोधाम मिश्रा की रिपोर्ट
बिक्रमगंज (रोहतास) “उम्र हो गई है, इसलिए कमजोरी तो रहेगी ही।” बुजुर्गों की किसी नई परेशानी पर परिवार में अक्सर यही पहला जवाब सुनने को मिलता है। चक्कर आना, चलते समय पैर लड़खड़ाना, अचानक अत्यधिक नींद आना या व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षणों को भी कई बार बढ़ती उम्र का सामान्य असर मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जबकि हर बार इसकी वजह उम्र नहीं होती। कई बार शरीर इन लक्षणों के जरिए किसी ऐसी समस्या का संकेत दे रहा होता है, जिसका समय पर पता लगना बेहद जरूरी है। ऐसी ही एक समस्या है रक्त में सोडियम का कम होना, जिसे हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है।
क्या है हाइपोनेट्रेमिया?
रक्त में सोडियम का सामान्य स्तर लगभग 135 से 145 मिलीमोल प्रति लीटर माना जाता है। 135 से कम होने पर हाइपोनेट्रेमिया की स्थिति मानी जाती है। सोडियम शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ मस्तिष्क, नसों और मांसपेशियों के सामान्य कामकाज के लिए भी महत्वपूर्ण है।
बुजुर्गों में क्यों बढ़ता है खतरा?
उम्र बढ़ने के साथ शरीर की पानी और इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन बनाए रखने की क्षमता में बदलाव आता है। इसके अलावा गुर्दे, हृदय और यकृत से जुड़ी बीमारियों की संभावना बढ़ती है तथा कई बुजुर्ग एक साथ कई दवाओं का सेवन करते हैं। ऐसे में उम्रदराज लोगों में सोडियम असंतुलन के प्रति विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है।
दीर्घकालिक बीमारियां, कई दवाओं का इस्तेमाल और पोषण की कमी भी बुजुर्गों में सोडियम असंतुलन से जुड़े महत्वपूर्ण कारक हो सकते हैं।
हर कमजोरी उम्र की वजह से नहीं
सोडियम कम होने पर कमजोरी, चक्कर, अत्यधिक नींद, चलने में अस्थिरता, भ्रम और व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। यही कारण है कि इन लक्षणों को कई बार “उम्र का असर” समझकर छोड़ दिया जाता है।
एक अध्ययन में 696 बुजुर्गों में हल्का हाइपोनेट्रेमिया करीब 16 प्रतिशत लोगों में पाया गया। गिरने की समस्या वाले बुजुर्गों में यह अनुपात लगभग 26 प्रतिशत था, जबकि बिना गिरने वाले समूह में करीब 13 प्रतिशत था। यह आंकड़ा यह साबित नहीं करता कि हर बार गिरने की वजह सोडियम की कमी ही है, लेकिन बार-बार गिरने वाले बुजुर्गों में सोडियम स्तर की जांच को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
सोडियम कम है तो नमक बढ़ा दें? नहीं
यह सबसे आम गलतफहमियों में से एक है। रक्त में सोडियम कम होने का मतलब हमेशा भोजन में नमक की कमी नहीं होता। कई बार शरीर में पानी की मात्रा अधिक होने से रक्त में सोडियम का स्तर कम दिखाई देता है।
हृदय, गुर्दे या यकृत से जुड़ी कुछ बीमारियां, हार्मोन संबंधी समस्याएं और SIADH जैसी स्थितियां भी इसके पीछे हो सकती हैं। इसके अलावा कुछ दवाएं, विशेष रूप से कुछ मूत्रवर्धक और कुछ अवसादरोधी दवाएं, हाइपोनेट्रेमिया का जोखिम बढ़ा सकती हैं।
इसलिए सोडियम कम मिलने पर पहला सवाल यह होना चाहिए कि “सोडियम कम क्यों हुआ?”
इलाज में जल्दबाजी भी हो सकती है खतरनाक
हाइपोनेट्रेमिया का उपचार उसके कारण पर निर्भर करता है। केवल नमक बढ़ाना हर मामले में पर्याप्त नहीं होता। कुछ परिस्थितियों में पानी की मात्रा नियंत्रित करनी पड़ सकती है, जबकि कुछ मामलों में मूल बीमारी या दवाओं की समीक्षा आवश्यक होती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सोडियम के स्तर को बहुत तेजी से सामान्य करना भी खतरनाक हो सकता है। तेजी से सुधार होने पर मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंचाने वाली ऑस्मोटिक डिमायलिनेशन सिंड्रोम जैसी जटिलता हो सकती है। इसलिए गंभीर हाइपोनेट्रेमिया का उपचार चिकित्सकीय निगरानी में ही किया जाना चाहिए।
पानी भी संतुलित मात्रा में जरूरी
गर्मी के मौसम में पानी पीना जरूरी है, लेकिन “जितना ज्यादा पानी, उतना बेहतर” हर व्यक्ति के लिए सही नहीं है। बुजुर्गों में पानी की जरूरत उम्र, मौसम, शारीरिक गतिविधि, गुर्दे और हृदय की स्थिति तथा दवाओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
बिना चिकित्सकीय सलाह के पानी बहुत कम करना या जरूरत से बहुत अधिक पानी पीना—दोनों से बचना चाहिए।
ये लक्षण दिखें तो तुरंत रहें सतर्क
यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति में अचानक भ्रम, अत्यधिक नींद, तेज कमजोरी, बार-बार उल्टी, चलने में अचानक परेशानी, दौरा, बेहोशी या चेतना में बदलाव दिखाई दे, तो इसे केवल उम्र का असर मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षणों में तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी हो सकता है।
जरूरत है नजरिया बदलने की
बुजुर्गों की देखभाल में रक्तचाप, रक्तशर्करा और हृदय संबंधी बीमारियों पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता है। अब पानी और इलेक्ट्रोलाइट के संतुलन को भी गंभीरता से देखने की जरूरत है।
हाइपोनेट्रेमिया हमें दो महत्वपूर्ण बातें सिखाता है—हर कमजोरी उम्र की वजह से नहीं होती और हर कम सोडियम का मतलब नमक की कमी नहीं होता।
इसलिए जांच रिपोर्ट में सोडियम का स्तर कम आए तो घबराने या खुद से नमक बढ़ाने के बजाय उसके कारण को समझना जरूरी है। स्वस्थ बुढ़ापा केवल लंबी उम्र का नाम नहीं, बल्कि सुरक्षित और सक्रिय जीवन का नाम है। इस जीवन में रक्तचाप और रक्तशर्करा के साथ जरूरत पड़ने पर सोडियम स्तर पर भी नजर रखना जरूरी है।
लेखक परिचय
डा. देवेश पाण्डेय
सहायक प्रोफेसर
अनजबित सिंह महाविद्यालय, बिक्रमगंज, रोहतास




















