
जमुई डीएम के निर्देश पर तमकुलिया ग्राम से समाज कल्याण विभाग की वस्त्र वितरण योजना का हुआ शुभारंभ
DPRO डॉ मेनका कुमारी सामाजिक सुरक्षा कोषांग की सहायक निर्देशक श्री मती काजोल मोदी भी हुई शामिल।
ग्रामीण महिलाओं ने छठ गीत गाकर माहौल को भक्तिमय बना दिया।
पदाधिकारियों की टीम ने यहां की स्थानीय हस्तशिल्प कला का जायजा लेकर उत्पादों को बाजार से जोड़ने की संभावनाएं तलाशी।
जमुई जिला ब्यूरो डॉ बिरेंद्र कुमार की रिपोर्ट
जमुई: छठ महापर्व केवल आस्था और उपासना का पर्व नहीं, बल्कि हमारी लोकसंस्कृति, परंपराओं और स्थानीय शिल्प-कौशल से जुड़ी समृद्ध विरासत का भी प्रतीक है। इसी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने और स्थानीय परंपराओं को प्रोत्साहित करने की दिशा में जिला प्रशासन ने एक विशेष पहल की है।
जिला पदाधिकारी के निर्देशानुसार आज बरहट प्रखंड के तमकुलिया ग्राम में सामाज कल्याण विभाग की ‘वस्त्र वितरण योजना’ की शुरुआत हुई। इस योजना के तहत के तहत ग्रामीणों के बीच साड़ी,धोती एवं चादर का वितरण सहायक निदेशक सामाजिक सुरक्षा कोषांग, श्रीमती काजोल मोदी द्वारा किया गया।

उल्लेखनीय है कि बरहट प्रखंड का तमकुलिया गांव अपनी विशिष्ट हस्तशिल्प परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां स्थानीय कारीगरों द्वारा पीढ़ियों से छठ महापर्व सहित विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक अवसरों और रोजमर्रा के जीवन में उपयोग में लाई जाने वाली सूप, डलिया, दौरा, सजावटी समान सहित अन्य पारंपरिक सामग्रियों का निर्माण किया जाता रहा है।

इन हस्तनिर्मित वस्तुओं का छठ पूजा में विशेष महत्व है। सूर्योपासना के इस महापर्व में अर्घ्य अर्पित करने से लेकर प्रसाद एवं पूजन सामग्री सजाने तक इनका उपयोग हमारी लोकपरंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
इस अवसर पर जिला उद्योग केंद्र महाप्रबंधक श्री शुभम कुमार भी उपस्थित रहे। उन्होंने भी इस गांव का स्थलीय निरीक्षण कर स्थानीय कारीगरों द्वारा निर्मित हस्तशिल्प उत्पादों की जानकारी ली तथा उनके उत्पादों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराने की संभावनाओं का जायजा लिया।

स्थानीय कारीगरों को बाजार से जोड़ने, उनके उत्पादों की पहचान बढ़ाने तथा पारंपरिक हुनर को आजीविका के बेहतर अवसरों में परिवर्तित करने की दिशा में आवश्यक संभावनाओं पर भी विचार किया गया।
इस गांव के स्थलीय भ्रमण के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि जमुई की पहचान केवल इसकी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के गांवों में पीढ़ियों से संरक्षित लोककला, हस्तशिल्प और पारंपरिक हुनर भी इसकी सांस्कृतिक समृद्धि के महत्वपूर्ण आधार हैं।

तमकुलिया जैसे गांव इस बात के जीवंत उदाहरण हैं कि हमारी लोकपरंपराएं आज भी ग्रामीण जीवन, आजीविका और पर्व-त्योहारों के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं।

जिला प्रशासन का प्रयास है कि ऐसी पारंपरिक कलाओं को केवल सांस्कृतिक विरासत के रूप में संरक्षित न रखा जाए, बल्कि उन्हें सम्मान, पहचान और बाजार उपलब्ध कराकर स्थानीय कारीगरों की आर्थिक उन्नति का माध्यम भी बनाया जाए।




















