
रोहतास जिले के दावथ में स्थित 500 वर्ष पुराना माँ आशावरी मंदिर, नवमी पर उमड़ता है जनसैलाब
रोहतास दावथ संवाददाता चारोधाम मिश्रा की रिपोर्ट
दावथ (रोहतास ) बिक्रमगंज अनुमंडल मुख्यालय से मात्र 9 किलोमीटर की दूरी पर प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के बीच बसा है आस्था का केंद्र – प्राचीन माँ आशावरी मंदिर।
करीब 500 वर्ष पुराने इस मंदिर का इतिहास बेहद रोचक है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह मंदिर ढेकहा राजपूत वंश की कुलदेवी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि भारत में जहाँ कहीं भी ढेकहा राजपूत रहते हैं, उनका मूल स्थान दावथ ही है, इसलिए वे साल में एक बार यहाँ जरूर दर्शन करने आते हैं।
नवमी पर देशभर से आते हैं श्रद्धालु
यहाँ साल में तीन बार विशेष पूजन का आयोजन होता है –
1. शारदीय नवरात्र में
2. चैत्र नवरात्र में
3. माँ के जन्मोत्सव पर
खासकर शारदीय नवरात्र की नवमी के दिन यहाँ का दृश्य देखने लायक होता है। इस दिन भारत के विभिन्न राज्यों – बिहार, झारखण्ड,उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र तक से श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं और परिवार की खुशहाली, संतान प्राप्ति और मनोकामना पूर्ति के लिए माँ से दुआ मांगते हैं।

मंदिर के पुजारी श्री अंजनी पाठक ने बताया कि – “जो भी भक्त सच्चे मन से माताजी का दर्शन करता है, माँ आशावरी उसकी सभी मन्नतें पूरी करती हैं। माँ के दरबार से आज तक कोई खाली हाथ नहीं लौटा।”
ग्रामीणों के सहयोग से चलता है मंदिर
मंदिर काफी विशाल है। इसकी देखभाल का कार्य मंदिर समिति के सदस्यों एवं गांव के लोगों द्वारा किया जाता है।
मंदिर की एक और खास बात इसके प्रांगण में स्थित विशाल पुस्तकालय है। जहाँ शाम के समय गाँव के छात्र-छात्राएं बैठकर अध्ययन करते हैं। यह पुस्तकालय भी ग्रामीणों के सहयोग से ही चलता है।
दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर समिति द्वारा पीने के स्वच्छ पानी और ठहरने के लिए धर्मशाला का भी उचित प्रबंध किया गया है।
मंदिर के नए शिखर का निर्माण पूरा होने के बाद मंदिर की भव्यता और भी बढ़ गई है, जो अब दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।




















