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दहेज मांगना, दहेज लेना समाज के लिए अभिशाप है: श्री जीयर स्वामी जी महाराज

दहेज मांगना, दहेज लेना समाज के लिए अभिशाप है: श्री जीयर स्वामी जी महाराज

रोहतास दावथ संवाददाता चारोधाम मिश्रा की रिपोर्ट 

दावथ ( रोहतास): परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि शादी विवाह में दहेज मांगना समाज पर एक बहुत बड़ा अभिशाप हैं। जब भगवान राम जी का भी विवाह हुआ था, उस समय दहेज राजा जनक के द्वारा दिया गया था।

लेकिन राजा दशरथ ने जनक जी से कुछ नहीं मांगा था। राजा जनक स्वेच्छा से इतना ज्यादा दहेज दे दिए थे कि अयोध्या में रखने के लिए जगह नहीं था। अयोध्या में दहेज में दिया हुआ सामान बाहर रखा गया।

वहीं आगे चलकर के मणि पहाड़ के नाम से जाना गया, जो आज भी अयोध्या में स्थित है। ऐसा नहीं है कि पहले दहेज की परंपरा नहीं थी। लेकिन आज जिस तरीके से शादी विवाह में लड़का पक्ष के द्वारा लड़की पक्ष के पिता को प्रताड़ित करके दहेज मांगा जा रहा है। यह सरासर गलत है।

लड़के के पिता के द्वारा मंडप का बंधन खोलने के लिए अलग से दहेज, खाना खाने के लिए अलग से दहेज, मतलब हर चीज में कुछ न कुछ डिमांड किया जाता है।

वहीं जिस लड़के का शादी हो रहा है, उसको भी खाना खाने के लिए जब ससुराल में दिया जाता है तो कहता है कि नहीं हम जब तक सोना का चैन, अंगूठी नहीं मिलेगा तब तक हम नहीं खाएंगे। यह जो नया चलन शुरू हो गया है, यह बहुत ही गलत है।

स्वेच्छा से जो लड़की के तरफ से मिल जाता है, उसको ले लेना चाहिए। लेकिन विवाह के अवसर पर डिमांड करना बहुत ही गलत है। शादी विवाह में कुल, गोत्र, जाति इत्यादि की मुख्य रूप से प्रधानता होना चाहिए। लड़का और लड़की योग्य होना चाहिए। शादी विवाह का विशेष महत्व है।

शास्त्रों में बताया गया है कि जिस घर में लड़का का शादी होता है, उस घर के लड़की के माता-पिता का संस्कार आगे की वंश परंपरा में भी दिखाई पड़ता है। जो भी बालक या बालिकाएं जन्म लेती है, उसमें पांच लोगों का संस्कार शामिल हो जाता है।

माता-पिता का संस्कार, दादा-दादी का संस्कार, नाना नानी का संस्कार, गुरु का संस्कार, पूर्वजों का संस्कार इत्यादि। इसीलिए जिस घर में भी विवाह करना चाहिए, उस घर के भी संस्कार को देखना चाहिए। शास्त्रों में यहां तक बताया गया है कि अच्छे घर में भी दुराचारी जन्म ले सकता है तथा दुराचारी के घर में भी अच्छे लोग जन्म ले सकते हैं।

मनु और शतरूपा के खानदान में भी कुछ दुराचारी लोग आगे वंश परंपरा में हुए। बताया गया है कि मनु और शतरूपा से पांच संतान हुए थे। जिसमें दो पुत्र हुए थे। जिनका नाम प्रियव्रत और उत्तानपाद था। तीन पुत्रियां हुई थी। जिनका नाम आकृति, देवहूति और प्रसूति बताया गया है। इन तीन कन्याओं का विवाह आकृति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ हुआ था।

देवहूति का विवाह कर्दम ऋषि के साथ हुआ था। प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ था। मनु और शतरूपा के दो पुत्रों में प्रथम पुत्र प्रियव्रत घर छोड़कर के जंगल में तपस्या साधना के लिए चले गए थे।

दूसरे पुत्र उत्तानपाद का शादी विवाह हुआ। उत्तानपाद की पहली पत्नी का नाम सुनीति था तथा दूसरी का सुरुचि था। इन दोनों से दो अलग-अलग पुत्र हुए सुनीति से ध्रुव जी हुए। सुरुचि से उत्तम नाम के पुत्र हुए।

ध्रुव जी बाल्यावस्था में ही साधना तपस्या करने के लिए घर से निकल गए थे। जिसके बाद भगवान श्रीमन नारायण को प्रसन्न किए। वरदान पाकर के वापस अपने राज्य का व्यवस्था संभाले, वहीं उत्तानपाद 3600 वर्ष राजकाज संभाले।

ध्रुव जी के भाई उत्तम यक्ष के साथ विवाद करके अपने आप को समाप्त कर लिए थे। यक्षों के राजा कुबेर जी हैं। बाद में ध्रुव जी और कुबेर जी के बीच समझौता हुआ।

इधर ध्रुव जी राजकाज की व्यवस्था संभाल रहे थे। वहीं ध्रुव जी का विवाह भी हुआ। प्रजापति शिशुमार की पुत्री भ्रमी के साथ प्रथम विवाह हुआ। जिससे दो पुत्र हुए। जिनका नाम कल्प और वत्सर हुआ। ध्रुव जी का दूसरा विवाह वायु के पुत्री इला के साथ हुआ। जिससे उत्कल नाम के एक पुत्र और एक पुत्री हुए।

आगे चलकर ध्रुव जी ने अपने पुत्र उत्कल को राज काज की व्यवस्था संभालने को कहा। वही उत्कल राजा बनकर राजकाज की व्यवस्था संभालने लगे। ध्रुव जी अपने राजकाज की समय को पूरा करके भगवान विष्णु के लोक जाने लगे। उनको लेने के लिए भगवान के पार्षद विमान लेकर पहुंचे थे।

वहीं ध्रुव जी जब विमान से जा रहे थे तो उस समय उनको याद आया कि मेरी माता कहां हैं। उनको भी मेरे साथ चलना चाहिए। वही भगवान के पार्षदों ने ध्रुव जी से कहा कि आपकी माता भी दूसरे विमान से भगवान के लोक जा रही हैं।

इस बात को सुनकर ध्रुव जी प्रसन्नता के साथ आगे बढ़ने लगे। वही जब ध्रुव जी भगवान के लोक में पहुंचे तो भगवान श्रीमन नारायण ने ध्रुव जी के लिए एक ध्रुव लोक का निर्माण किया। जहां पर ध्रुव जी अपने लोक में वास करने लगे।

ध्रुव जी की पहली पत्नी के दो पुत्र कल्प और वत्सर की भी जीवन लीला समाप्त हो गयी। उत्कल जो राजकाज की व्यवस्था संभाल रहे थे, उनका राजकाज चलाने की व्यवस्था को देखकर के प्रजा उनको थोड़ा दूसरे नजर से देख रही थी। आगे चलकर ध्रुव जी के वंश परंपरा में राजा अंग हुए।

जिनका विवाह मृत्यु की बेटी सुनीथा के साथ हुआ। वही राजा अंग और सुनीथा से एक पुत्र हुआ। जिसका नाम राजकुमार वेन हुआ। मनु शतरूपा और ध्रुव जी जैसे कुल खानदान में वेन बहुत ही उपद्रवी हुआ।

जो अपने आप को भगवान मानने लगा था। कहने लगा कोई भी जप, तप, पूजा, पाठ, हवन करेगा वह मेरे नाम को लेकर करेगा। हम भगवान हैं, हम सब कुछ हैं, इस प्रकार से उपद्रवी हुआ।

आगे चलकर के उसी के राज्य के लोग मिलकर के उसको समाप्त कर दिए। वहीं राजा वेन जब समाप्त हो गया । तब राज्य के रहने वाले लोग सोचने लगे कि कोई न कोई एक राजा जरूर होना चाहिए। वही उसके शरीर का मंथन किया गया।

जिसके बाद मंथन से एक लड़का और लड़की निकले। लड़का का नाम राजा पृथु हुआ और लड़की का नाम अर्ची हुआ। राजा पृथु भगवान विष्णु के अवतार थे। वही आर्ची लक्ष्मी के अवतार के रूप में प्रकट हुई।

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