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बिहारराज्यरोहतास

अपराध और अपराधियों के प्रवृत्ति पर नियंत्रण करने का सबसे बड़ा माध्यम है सत्संग: श्री जीयर स्वामी जी महाराज

अपराध और अपराधियों के प्रवृत्ति पर नियंत्रण करने का सबसे बड़ा माध्यम है सत्संग: श्री जीयर स्वामी जी महाराज

रोहतास दावथ संवाददाता चारोधाम मिश्रा की रिपोर्ट

दावथ (रोहतास)परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि सत्संग और संत अपराध की प्रवृत्ति को पूरी तरीके से खत्म करते हैं। अपराध और अपराधियों पर नियंत्रण करने के लिए सरकार कई प्रकार के कानून बनाती है। जिसके लिए कानून व्यवस्था, न्यायालय, पुलिस प्रशासन लगातार काम करते हैं। जिसके माध्यम से अपराधियों को नियंत्रित किया जाता है। लेकिन अपराधियों के अपराध करने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण नहीं हो पाता है। जब तक अपराधी के अपराध करने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण नहीं किया जाए, तब तक पूरी तरीके से अपराध पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है। वही संत और सत्संग के संगत में रहने से अपराध करने की प्रवृत्ति पर पूर्ण रूप से नियंत्रण कर दिया जाता है। जिससे अपराधी अपराध करने की प्रवृत्ति को ही छोड़ देता है।

वैसे सत्संग और संत समाज के सुधार के लिए बहुत जरूरी है। समाज में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो कहते हैं कि धर्म, पूजा, पाठ, यज्ञ से कोई फायदा नहीं है। कुछ समय के लिए मान लिया जाए कि मोक्ष, धर्म, कर्म इत्यादि का कोई डायरेक्ट लाभ दिखाई नहीं पड़ता है। वैसे धर्म, यज्ञ, पूजा, पाठ का लाभ वास्तव में भी दिखाई पड़ता है। लेकिन कुछ अधार्मिक प्रवृत्ति के लोग इस पर विश्वास नहीं करते हैं, उन लोगों को समझना चाहिए। सरकार अपराध नियंत्रण के लिए लाखों करोड़ों रुपए खर्च करती है। जिससे अपराध पर पूर्ण रूप से नियंत्रण नहीं हो पाता है। वही संत, महात्मा, यज्ञ, सत्संग के माध्यम से अपराध करने वाले लोगों की प्रवृत्ति को ही बदल देते हैं। उनका समाज के प्रति कितना बड़ा योगदान है। धर्म केवल मंदिर में जाकर के पूजा करना, घंटी बजाना ही नहीं है, बल्कि समाज, संस्कृति, व्यक्ति, व्यक्तित्व को सही दिशा देना भी धर्म कहा जाता है। वैसा आचरण, व्यवहार, विचार, ज्ञान, मार्गदर्शन जिससे समाज में शांति सद्भाव आहार व्यवहार आचरण बेहतर होता है, उसे भी धर्म कहा जाता है। ऐसे धर्म के लिए सत्संग जरूरी है। संत जरूरी है। इसलिए समाज में यज्ञ, पूजा, पाठ, सत्संग, कथा का महत्व सामाजिक स्तर पर सुधार के लिए भी बहुत जरूरी है।

जिस प्रकार से भोजन बनाने के लिए सारा सामान उपलब्ध हो, लेकिन जब तक उस सामग्री का सही तरीके से उपयोग करके भोजन नहीं बनाया जाता है। उसको बनाकर के प्रसाद ग्रहण नहीं किया जाता है। तब तक उस सामग्री का कोई महत्व नहीं होता है। जिस प्रकार से वैदिक परंपरा के अनुसार जितने भी धार्मिक ग्रंथ, इतिहास, पुराण, वेद, उपनिषद इत्यादि हैं। उनको जब तक संत एवं सत्संग के द्वारा लोगों को पान नहीं कराया जाएगा, तब तक उस धार्मिक ग्रंथो का लोग महत्व, तेज, ऊर्जा, ज्ञान, मार्गदर्शन को कैसे ग्रहण कर पाएंगे। इसीलिए संत और सत्संग के द्वारा मानव जीवन जीने के लिए उन धार्मिक ग्रंथो का नित्य प्रतिदिन पान कराया जाता है। जिसके माध्यम से व्यक्ति का व्यक्तित्व बदल जाता है। समाज में रहन-सहन, आहार व्यवहार, जीवन शैली में बड़ा परिवर्तन होता है। जिससे समाज में समरसता, ज्ञान, एक दूसरे के प्रति सम्मान, आधार की भावना बनती है। जिससे समाज का कल्याण होता है।

इतिहास, पुराण में जितनी भी कथाएं लिखी गई है, वह कथाएं इतिहास में घटित वास्तव घटनाओं के आधार पर लिखा गया है। जिस प्रकार से जो लोग गुजर जाते हैं, उनकी प्रतिमा आज लगाई जा रही है। जो आगे भविष्य में इतिहास के रूप में ही उनको याद किया जाएगा। इस प्रकार से जो धार्मिक ग्रंथो में लिखा गया है, वह पूर्ण रूप से वास्तविक और उस समय के सत्य पर आधारित है। जिसका ज्ञान नहीं होने के कारण लोग उसके बारे में जानते ही नहीं है। वैसे पुराण और इतिहास की जो वास्तविक घटना है, उस घटना को संत महात्मा सत्संग के माध्यम से लोगों को समझाते हैं। जिससे वर्तमान पीढ़ी के साथ आने वाली जो पीढ़ी है, वह भी सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होती है।

श्रीमद् भागवत कथा अंतर्गत स्वामी जी ने बताया कि राजा अंग के वंश परंपरा में वेन हुए। जिनके शरीर को मंथन करके भगवान श्रीमन नारायण के अंशावतार के रूप में राजा पृथु हुए तथा लक्ष्मी स्वरूपा आर्ची हुई। वहीं राजा पृथु और आर्ची के द्वारा राजकाज की व्यवस्था व्यवस्थित किया गया। उस समय पृथ्वी उपजाऊ नहीं थी। क्योंकि राजा वेन के द्वारा जिस प्रकार से पृथ्वी पर अत्याचार किया गया था, जिसके कारण पृथ्वी बहुत नाराज हो गई थी। वहीं राजा पृथु के द्वारा पृथ्वी को अन्न फल इत्यादि उपजाऊ बनाने के लिए एक दिन वहां पर तीर बात पर चढ़ा लिया गया।

जिसके बाद वहीं पर पृथ्वी माता प्रकट हुई। वहीं पृथ्वी माता के द्वारा अपनी समस्याओं को राजा पृथु को बताया गया। जिसके बाद राजा पृथु ने पृथ्वी माता से कहा कि आप लोगों के कल्याण के लिए फल फूल इत्यादि की व्यवस्था कीजिए। आगे चलकर के राजा पृथु के द्वारा 100 अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया गया। वहीं 99 यज्ञ पूर्ण होने के बाद जब राजा पृथु 100वां यज्ञ कर रहे थे, तब राजा इंद्र के द्वारा यज्ञ के अश्वमेध घोड़े को चुरा लिया गया। इंद्र को लग रहा था कि जो भी लोग यज्ञ कर रहे हैं, वह यदि सफल हो जाएंगे तो मेरे गद्दी को प्राप्त कर लेंगे। इसीलिए इंद्र के द्वारा लगातार यज्ञ को बाधित किया जाने लगा। उस समय राजा पृथु दंड देने के लिए इंद्र पर क्रोधित हो गए थे। जिसके बाद भगवान श्रीमन नारायण प्रगट होकर के राजा पृथु को समझाए। आप भगवान श्रीमन नारायण के अंशावतार हैं।

इंद्र को आप क्षमा कर दीजिए। क्योंकि जो व्यक्ति सदाचार से जीवन जीता है, उसका यज्ञ यदि एक पूरा नहीं होता है, तब भी उससे उसका कुछ नहीं बिगड़ सकता है। आगे चलकर के सनक सनंदन सनातन सनत्कुमार राजा पृथु के राज्य में आए। जिनके द्वारा राजा पृथु को 16 प्रकार के आचरण का उपदेश दिया गया है। जिसमें सनक सनंदन सनातन सनत्कुमार ने बताया कि व्यक्ति को जीवन जीने के लिए सदाचार रूपी व्रत को धारण करना चाहिए। सदाचार एक ऐसा बड़ा व्रत है जिसके माध्यम से व्यक्ति भगवान की भक्ति और शरणागति को प्राप्त कर सकता है।

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